अंकिता भंडारी केस: 4 साल बाद भी इंसाफ का इंतजार,कथित वीआईपी पर सवाल बरकरार
मीडिया लाइव, देहरादून/श्रीनगर : 18 सितंबर 2022 की उस रात की कल्पना से आज भी समूचा उत्तराखंड व्यथित हो उठता है। ऋषिकेश लक्षमण झूला क्षेत्र के वनंत्रा रिजॉर्ट में 19 साल की मासूम भोली भाली पहाड़ी लड़की अंकिता भंडारी, जो रिसेप्शनिस्ट की नौकरी से अपने परिवार के अच्छे दिनों की उम्मीद लगाए हुए बैठी थी। उसने अपने दोस्त को आखिरी चैट में सिर्फ इतना लिखा था “यहाँ एक वीआईपी आ रहा है, मुझ पर उसको स्पेशल सर्विस देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। बस फिर क्या था “उस इनकार की कीमत अंकिता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
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ठीक आज से चार साल पहले 18-19 सितंबर की उस दरमियानी रात उसे रिजॉर्ट मालिक और उसके दो साथियों ने चीला बैराज में धकेल दिया। इसके बाद अंकिता का अपने परिवार से कोई सम्पर्क न होने के कारण उसकी ढूंढ-खोज शुरू हो गयी। काफी हो हल्ला मचने के बाद प्रशासन और पुलिस हरकत में आई। 24 सितंबर को उसका शव चीला नहर से बरामद किया गया। आज उस घटना को ठीक चार साल हो रहे हैं।
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कोटद्वार की जिला अदालत ने 30 मई 2025 को इस मामले में रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य, मैनेजर सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी है। कानून ने अपना एक हिस्सा पूरा किया। पर पहाड़ के हर घर में एक सवाल आज भी अधूरा है – वो कथित वीआईपी कौन था? इस सवाल की दो सरकारी तस्वीरें हैं, और दोनों को जानना जरूरी है।
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पहली तस्वीर :- मामले की जांच करने वाली राज्य सरकार की पुलिस की SIT के सदस्य रहे शेखर सुयाल ने प्रेस वार्ता में स्पष्ट किया था कि उनकी जांच में किसी वीआईपी के आने का कोई प्रमाण नहीं मिला। चैट में जिस व्यक्ति को लेकर चर्चा थी, उसकी पहचान नोएडा निवासी धर्मेंद्र कुमार के रूप में हुई थी, जो जमीन के काम से वहां आया था और उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला।
दूसरी तस्वीर :- सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ ऑडियो-वीडियो और राज्य भर में उठे जन आक्रोश के बाद उत्तराखंड सरकार ने 9 जनवरी 2026 को इस मामले के इस पहलू की जांच CBI से कराने की सिफारिश की। इसके बाद CBI की दिल्ली स्थित स्पेशल क्राइम ब्रांच ने अनिल कुमार जोशी की शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में अज्ञात कथित वीआईपी के खिलाफ FIR दर्ज की है। इस मामले की जांच CBI कर रही है। CBI केंद्र सरकार की जांच एजेंसी है जो कार्मिक मंत्रालय के अधीन काम करती है। । यह मंत्रालय सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अंतर्गत आता है।
आज घटना की चौथी बरसी पर अंकिता के माता-पिता वीरेंद्र भंडारी और सोनी देवी फिर से अकेले नहीं हैं। आज देहरादून में CBI के वसंत विहार स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के बाहर और ऋषिकेश, पौड़ी, हल्द्वानी में सामाजिक संगठनों ने मौन श्रद्धांजलि और प्रदर्शन का ऐलान किया है। वे नारे नहीं लगा रहे, वे सिर्फ एक नाम मांग रहे हैं। आज का दिन सिर्फ मीडिया की सुर्ख़ियों के लिए एक श्रद्धांजलि नहीं, एक चेतावनी है माना जा रहा है।
इस मुद्दे को लेकर लगातार गंभीर रहे आम लोगों को मानना है अंकिता की हत्या ने हमें एक बहुत कड़वा सच दिखाया है – जब सत्ता, रसूख और अपराध एक ही टेबल पर बैठ जाते हैं, तो सबसे पहले एक गरीब की बेटी की चीख दबती है। राजनीति में अपराधीकरण किसी पार्टी का विषय नहीं है, यह समाज के चरित्र का विषय है। जो भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी दल, किसी भी ओहदे पर हो, अगर किसी अपराध में शामिल है या जांच को प्रभावित करता है, तो वो जनप्रतिनिधि कहलाने लायक नहीं है। ऐसे मामलों में समाज को लोकतांत्रिक तरीके से अपना फैसला सुनाना होगा। कानूनी और नैतिकता के दायरे में – उनका साथ नहीं, उनका मंच नहीं, उनका सम्मान नहीं। वोट की ताकत से, राजनीतिक मंचों और रैलियों से दूरी बनाकर, और जनता की सबसे बड़ी अदालत में सवाल पूछ कर। जब तक अपराध पर राजनीति का कवच रहेगा, तब तक सभ्य और आम समाज और उसकी बेटियां असुरक्षित रहेंगी।
अंकिता की माँ आज भी कहती हैं – “मेरी बेटी तो चली गई, पर उस कथित वीआईपी का नाम बता दो ताकि किसी और की बेटी न मरे।”चार साल हो गए। क्या इस चौथे साल भी उत्तराखंड को सिर्फ तारीख मिलेगी, इंसाफ नहीं?