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इन दिनों: वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और गैरसैंण

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मीडिया लाइव ब्यूरो: पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को यूं तो पूरी दुनिया जानती है। साहस, सौर्य, वीरता, मानवता,और संघर्ष के पर्याय थे वे। इसके इतर अगर बात करें पहाड़ की विषम भौगोलिक और कठिन, हाड़-तोड़ जीवन शैली की, तो गढ़वाली पहाड़ की रग-रग,घर-घर और पग-पग से वाकिफ थे। पहाड़ के लिए वे बहुत बड़ी पहचान के तौपर पर जाने जाते रहे। देश की आजादी के बाद जब पहाड़ के इस भूभाग को उत्तर प्रदेश का हिस्सा बनाया गया तो वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने इस क्षेत्र के लिए एक और लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया और वे तत्कालीन नेहरू सरकार और पूर्ववर्ती संयुक्त प्रांत और पश्चातवर्ती गोविन्द्र बल्लभ पंत की उत्तर प्रदेश सरकारों से अलग पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की मांग करने लगे। इसके लिए उन्होंने पूरी कार्ययोजना भी बनाई थी। राजधानी को लेकर उन्होंने तत्कालीन गढ़वाल जनपद के गैरसैंण को प्रदेश के सबसे मध्य में होने के कारण चयनित किया था। उसके अगल बगल रामगंगा नदी और पूर्वी नयार और पश्चिमी नयार से सटे हुए भूभाग को राजधानी क्षेत्र के तौर पर विकसित करने की उनकी योजना थी। शहरी करण और राजधानी के विकास के लिए सबसे जरूरी पर्याप्त पानी की उपलब्धता इसके लिए जरूरी संसाधन के तौर पर वहां मौजूद थी। इसकी मांग वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से करते रहे। वहीं पहली स्वतंत्र उत्तर प्रदेश सरकार के पहले मुख्यमंत्री जीबी पंत ने इस तरफ कोई गंभीरता नहीं दिखाई। जो कि खुद मूल रूप से पहाड़ के रहने वाले थे। इसके इतर प्रधानमंत्री नेहरू को वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के दबाव के चलते इस क्षेत्र का हवाई दौरा तक करना पड़ा। जिसमें उनके साथ गढवाली भी रहे। जिसमें नेहरू ने यह कहा था कि यह क्षेत्र तो देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए भी अनुकूल है। लेकिन उसके बाद जाने कौन सी राजनीतिक परिस्थितियों के चलते इस मुद्दे पर कोई भी बात आगे नहीं बढ़ पाई। इसके पश्चात दशकों तक पहाड़ के लोग अलग राज्य के लिए आंदोलन करते रहे। इसके लिए कई युवाओं महिलाओं को अपनी जान और आबरू तक की कुर्बानी देनी पड़ी। गढ़वाली का जीवन सेना के सिपाही से लेकर अंग्रेजी सेना के विद्रोही सैनिक के तौर पर वीर, साहसी और मानवता की रक्षा करने वाले एक शानदार शख्शियत के तौर पर जाना  जाता है। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से पूरा लोहा लिया दशकों तक उनकी यातनाएं सही, जेल डाले गये। लेकिन एक सच्चे देश भक्त के तौर पर लड़ते रहे, संघर्ष करते रहे। यहां तक कि आजादी के बाद भी स्वदेशी सरकार ने उन्हें जेल में डालकर यातनाएं दी। लेकिन फिर भी उस महान जीवट व्यक्तित्व ने उनके आगे भी घुटने नहीं टेके। दशकों तक इस लड़ाई को लड़ने के बाद जब गढ़वाली अपने गांव लौट आये और स्थानीय परेशानियों से जूझते लोगों को देख कर उन्होंने अलग राज्य और पहाड़ की समस्याओं के हल के लिए जागरूता अभियान छेड़ दिया। वे लोगों से अलग राज्य के लिए सामने आने का आग्रह करते रहे। बताया जाता है कि चन्द्र सिंह गढ़वाली खुद हाथ से भोंपू बना कर उससे गांव-गांव जाकर पहाड़वासियों को धै लगा कर एक करने की कोशिश करते रहे। यहां तक उन्होंने एक बार चुनाव तक लड़ा, लेकिन उनकी जमानत तक जब्त हो गयी। राजनीतिक इतिहास पर पकड़ रखने वाले लोगों का यहां तक कहना है कि उस दौर में नेहरू चाहते थे कि गढ़वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से टिकट लेकर चुनाव लडें। लेकिन गढ़वाली ने उनके इस प्रस्ताव को सीधे ना कह दिया। वे चाहते तो कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व के सामने राज्यसभा जाने का समझौता कर सकते थे। लेकिन वह महान व्यक्ति जानते थे कि पहाड़ की जरूरतों और परेशानियों को ये राष्ट्रीय दल कभी नहीं समझ सकते। लिहाजा उन्होंने अपने ही स्तर पर अपना संघर्ष जारी रखा और आखिरी समय तक उसके लिए लड़ते रहे।
आज लम्बे संघर्ष के बाद पहाड़ के लोगों को राज्य मिला पर उसका पूरा भूगोल बिगाड़ दिया, जिसकी परिकल्पना और सोच वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने की थी। बीते इन साढे सात सालों में गैरसैंण को लेकर थोड़ा बहुत काम हुआ है। जो उसे राजधानी के तौर पर चर्चा में बने रहने का मुद्दा बनाये रखने के लिए ऊर्जा का काम करता है। अभी वहां पर विधान भवन से लेकर मिनी सचिवालय बन कर तैयार हो चुके हैं। मंत्रियों और विधायक आवास बनने की प्रक्रिया में हैं। लेकिन यह सिर्फ गैरसैंण पर जन भावनाओं के दबाव में हुआ है। जिन लोगों को यहां अब तक नेतृत्व करने का अवसर मिला उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर या सियासी इच्छाशक्ति के तौर पर कोई भी कदम उठाने की जहमत नहीं उठाई। यहां तक कि उनकी इसमें कोई खास गंभीर दिलचस्पी भी नजर नहीं आयी । वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के विजन और दर्शन का अगर अध्ययन किया जाय, तो बीते 20 सालों में उस पर कोई खास निर्णय नहीं लिए गये। उनके नाम पर पर्यट स्वरोजगार की योजनाएं भले ही राज्य सरकार चला रही है। लेकिन इससे गढ़वाली के उत्तराखण्ड की परिकल्पना और सोच को सम्मान नहीं मिलता। यह महज उन्हें ऑपचारिक तौर पर स्मरण करने की परम्परा मात्र है, जो केवल रस्म अदायगी से ज्यादा भर नहीं है।

इस समय वर्तमान सरकार गैरसैंण में बजट सत्र आयोजित कर रही है। इतना ही नहीं मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सदन में घोषणा करते हुए कहा कि गैरसैंण  प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी होगी। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर किस साल से सरकार और विधायिका वहां विराजेगी। सरकार के मुखिया की इस घोषणा ने गैरसैंण को फिर से चर्चा में ला दिया है। पक्ष विपक्ष इसे लेकर अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी मढ़ रहे है। जिससे समझा जा सकता है कि मौजूदा विधायिका गैरसैंण और राज्य की स्थाई राजधानी को लेकर कितनी गंभीर है। सबसे गौर करने वाला तथ्य यह रहा कि बजट सत्र में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने की घोषणा तो जरूरी की गयी। लेकिन उसी दिन उसी सत्र में पेश किये गये बजट में राजधानी के तौर पर चन्द्र नगर गैरसैंण के विकास के लिए धन की व्यवस्था का कोई जिक्र नहीं किया गया। स्थिति स्पष्ट है जब बजट में गैरसैंण के विकास के लिए कोई विशेष व्यवस्था ही नहीं की गयी है, तो फिर यह किसी योजना में कैसे शामिल मान लिया जाये। बिना योजना के राजधानी के विकास का क्रम किस तरह से आगे बढ़ेगा इस पर सरकार की तरफ से न कोई बात कही गयी है और न बजट में धन की व्यवस्था का जिक्र है।

यहां विपक्ष पर भी सवाल उठते हैं कि उसने भी इतने बड़े मुद्दे पर सरकार से क्यों नहीं सवाल पूछा। इतना ही नहीं इसके बाद सीएम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। भावुकता के साथ उन्होंने पूरी कोशिश की कि जनभावना को देखते हुए वे बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल करने जा रहे हैं। यहां  तक कि मीडिया ने भी गैरसैंण को लेकर बजट की व्यवस्था का सवाल नहीं पूछा। तो क्या माना जाये कि जहां सरकार के इस बजट में देहरादून, हरिद्वार और मैदानी इलाकों के शहरों के विकास के लिए मेट्रो रेल, स्मार्ट सिटी और न जाने किन-किन योजनओं के लिए सैकड़ो करोड़ बजट की खास व्यवस्था की गयी है। वहीं राजनीतिक लाभ लेने के लिए की गयी ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा मात्र छलावा नहीं तो क्या है। क्या बिना योजना और धन के चन्द्र नगर गैरसैंण का विकास होगा। क्या कोई नया नगर, नयी राजधानी आकार ले सकती है। अब ये तो बहैसियत वित्तमंत्री और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और उनकी कैबिनेट ही बता सकती है कि आखिर यह चमत्कार होगा कैसे। कैसे वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के सपनो का राज्य अस्तित्व में आयेगा उसकी स्थाई राजधानी आकार लेगी और दुनिया को एक नया शहर ठेठ पहाड़ों के बीच देखने को मिलेगा। जो पर्यटन और प्रदेश की मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार बनेगा। जो पलायन पर रोक लगाने और खाली होते पहाड़ो की तरफ वापस रुख करने के लिए यहां के लोगों को आकर्षित करेगा।