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एचएनबीजीयू में भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन: गढ़वाल यूनिवर्सिटी में शुरू हुआ महा-अभियान, तैयार होंगी डिजिटल किताबें

जसपाल सिंह नेगी, देहरादून, 16 अक्टूबर 2026 : एचएनबीजीयू में भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन को बढ़ावा देने और उच्च शिक्षा के स्तर पर स्थानीय व क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटल कंटेंट को समृद्ध करने की दिशा में एक बड़ी पहल की गई है। उत्तराखंड के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (एचएनबीजीयू) में आयोजित इस विशेष राज्यस्तरीय कार्यक्रम का मुख्य मकसद शिक्षकों की लेखन क्षमता को और अधिक मजबूत करना है ताकि 22 आधिकारिक भारतीय भाषाओं में बेहतरीन डिजिटल शिक्षण सामग्री (Digital Study Material) तैयार की जा सके। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में शुरू हुई इस दो दिवसीय कार्यशाला में राज्यभर के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के जाने-माने शिक्षाविद और प्रोफेसर्स हिस्सा ले रहे हैं, जो आने वाले समय में उच्च शिक्षा की किताबों को एक नया रूप देंगे।

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2.5 लाख डिजिटल किताबें बनाने का बड़ा प्लान

इस दो दिवसीय कार्यशाला का टारगेट देश की 22 आधिकारिक भाषाओं में स्कूली और उच्च शिक्षा के लिए इंटरैक्टिव डिजिटल बुक्स (संवादात्मक डिजिटल पुस्तकें) तैयार करना है। इसका मकसद देश के हर कोने में बैठे छात्र को उसकी अपनी मातृभाषा में बेहतरीन और हाई-क्वालिटी पढ़ाई का कंटेंट मिल सके।

विषय विशेषज्ञ डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने इस दौरान तकनीक और अनुवाद के भविष्य पर बड़ी बात कही। उन्होंने बताया कि यह प्रोजेक्ट कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय बजट 2025 में खुद इसकी घोषणा की गई थी। इस महा-अभियान के तहत देशभर में करीब 2.5 लाख किताबें विकसित करने का प्रस्ताव है। डॉ. श्रीवास्तव ने जोर देकर कहा कि किताबों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद सिर्फ शब्दों को बदलना नहीं है, बल्कि मूल लेखक की भावना और ज्ञान को उसी रूप में सहेजना है।

पुस्तक लिखना राष्ट्र निर्माण है – कुलपति

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह ने यहाँ मौजूद शिक्षकों से कहा, “पुस्तकें लिखकर कोई भी व्यक्ति अमृत पिए बिना भी हमेशा के लिए अमर हो सकता है।” उन्होंने कहा कि किताबें हमारी सबसे अमूल्य धरोहर हैं और आज के दौर में पुस्तक लेखन सीधे तौर पर राष्ट्र निर्माण का काम है।

अपनी समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक बौद्धिक विरासत का उदाहरण देते हुए कुलपति ने ‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र’ का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के 15वें अध्याय में सदियों पहले ही रिसर्च मैथडोलॉजी (अनुसंधान पद्धति) पर विस्तार से बात की गई थी। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि हमारे ऐसे महान और ऐतिहासिक ग्रंथों का देश की अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद किया जाए ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को समझ सके।

उत्तराखंड के 25 से अधिक कॉलेजों का सहयोग

इस कार्यशाला को लेकर उत्तराखंड के अकादमिक जगत में भारी उत्साह देखने को मिला। कार्यक्रम में कुल 75 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिसमें 65 प्रोफेसर्स व अकादमिक एक्सपर्ट्स, 8 रिसर्च स्कॉलर्स (शोधार्थी) और 2 छात्र शामिल रहे। ये सभी प्रतिभागी उत्तराखंड के 25 से अधिक अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से यहां पहुंचे थे।
इस डिजिटल सत्र का संचालन डॉ. कविता भट्ट ने किया, जबकि समन्वय बनाने में डॉ. आलोक सागर गौतम ने मुख्य भूमिका निभाई। इस मौके पर  प्रो. आर. एस. नेगी,  प्रो. सीमा धवन, प्रो. डी. एस. नेगी, प्रो. एम. एस. नेगी, प्रो. सुरेंद्र सिंह बिष्ट,  प्रो. बी. पी. नैथानी शामिल रहे।

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