खेती- किसानी

मौसम ने उड़ाई किसानों के चेहरों की रंगत

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पंकज कुशवाल, देहरादून।

मौसम का मिजाज अब पहाड़ के किसानों पर भारी पड़ने लगा है। पहाड़ों में मार्च के दूसरे सप्ताह में भी बर्फवारी  और बारिश ने किसानों के चेहरे की हवा उड़ा दी है। मौसम का यह सितम आने वाले दिनों में क्या रंग दिखाएगा इसे लेकर किसानों के दिल की धड़कने भी बढ़ने लगी है। लगातार हो रही बर्फवारी और बारिश से जहां फसलों की बुआई निर्धारित समय से पीछे चल रही है तो वहीं खेतों में खड़ी फसल भी उचित तापमान न मिलने के कारण खराब होने की कगार पर पहुंच गई है। वहीं, सेब की बागवानी करने वाले उद्यानपतियों के माथे पर भी मौसम चिंता की लकीरें खींचने लगा है।

अमूमन पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों आलू की बुआई का दौर शुरू हो चुका होता है, लेकिन इस साल अब तक आलू की बुआई से पहले खेत की पहली जुताई तक नहीं हो सकी है। किसान बीज खाद के साथ तैयार बैठे हैं लेकिन मौसम का मिजाज किसानों और ख्ेातों के बीच बड़ी खाई पैदा कर रहा है। पहाड़ी इलाकों में नवंबर महीने से लगातार बर्फवारी से किसान बेहाल है। शुरूआती दौर में हुई बर्फवारी को खेती किसानी के लिए वरदान मानने वाले किसानों के लिए यही बर्फवारी बारिश अब मुश्किल का सबब बन रही है।
उत्तराखंड में आलू का उत्पादन करीब एक लाख टन से अधिक है। 28 हजार टनके औसतन उत्पादन के साथ उत्तरकाशी सबसे शीर्ष पर है। राज्य भर में आलू उत्पादन में उत्तरकाशी की हिस्सेदारी 20 फीसदी से भी अधिक है। पहाड़ी जिले उत्तरकाशी, चमोली, देहरादून, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, पिथौरागढ़ समेत अन्य जिलों में आलू प्रमुख नकदी फसल के तौर पर उगाई जाती है। आलू बुआई का समय सिर पर है और किसान अब तक खेतों को पूरी तरह से तैयार भी नहीं कर सके। लंबे समय से हो रही बर्फवारी के चलते मिट्टी में नमी भी किसानों के लिए मुसीबत बन चुकी है। मिट्टी को बर्फवारी और बारिश से मिली नमी से फसल पर अगेती झुलसा रोग की संभावना मुंह बाए खड़ी है।
वहीं, मौसम ने सेब उत्पादकों के चेहरे की हवाईयां भी उड़ा दी है। जैसे जैसे फ्लवारिंग कंडिशन का समय नजदीक आ रहा है, वैसे वैसे सेब उत्पादकों की दिल की धड़कने भी तेज होने लगी है। पारे में अपेक्षित बढ़ोत्तरी न होने से सेब के फ्लावरिंग कंडिशन पर बुरा असर पड़ना तय है। अमूमन सेब के पेड़ों पर फूल लगने के समय 18 डिग्री तक का तापमान आदर्श माना जाता है, लेकिन सेब उत्पादकों इलाकों में लंबे समय से पारा दस डिग्री पार भी नहीं पहुंच पा रहा है। राज्य में उत्तरकाशी, चमोली, देहरादून का चकराता समेत अन्य हिस्सों में करीब 80 हजार मिट्रीक टन के करीब सेब का उत्पादन होता है।
मौसम के इस बदले रूख का खामियाजा गेहूं, मटर समेत अन्य फसलों और फलों को भी उठाना पड़ रहा है। गेहूं की फसल को जरूरत से अधिक नमी मिलने से गेहूं के फसल के विकास पर भी विपरित असर पड़ने लगा है।
किसानों की माने तो तीन दश से अधिक समय बीतने के बाद इस कदर बर्फवारी हुई है, लिहाजा मौसम में हुए इस बदलाव के लिए न किसान तैयार थे न हीं खेती मौसम की इस मार के लिए तैयार थी।