उत्तराखण्ड न्यूज़

कर्नाटक के नतीजों से पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा को मिली ऊर्जा !

FacebookTwitterGoogle+WhatsAppGoogle GmailWeChatYahoo BookmarksYahoo MailYahoo Messenger

मीडिया लाइव, पौड़ी : पुरानी पेंशन बहाली के लिए पूरे देश में कर्मचारी, अधिकारी व शिक्षक लामबंद हैं। काफी समय से तमाम प्रदेशों में पुरानी पेंशन बहाली के लिए कर्मचारियों का संघर्ष जारी है।  कई राज्यों में ये राजनीतिक और चुनावी मुद्दे के तौर पर मजबूती से छाया रहा। पिछले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में कर्मचारियों ने अपनी ताकत दिखाते हुए पेंशन विरोधी सरकारों को सत्ता से हटाकर पेंशन बहाल करने वाली पार्टियों के पक्ष में वोट किया, जिसका असर देखा भी गया ।  ये मुद्दा अब देश व्यापी सियासत का केंद्रीय मुदा बनता जा रहा है।

आज कर्नाटक विधानसभा के चुनाव नतीजे आ गए हैं। इस परिणाम पर कर्मचारियों की नाराजगी की झलक साफ देखी जा सकती है। जिस तरह कर्मचारियों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है और वह लगातार लोकतांत्रिक तरीके से अपनी जायज मांग को मनवाने के लिए संघर्षरत है। इसका बड़ा असर विभिन्न राज्यों में होने  वाले विधानसभा चुनावो में भी दिखने की अटकलें लगाई जा रही हैं।

उत्तराखंड में भी राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा लगातार सक्रिय है।  हालांकि बीते बरस उत्तराखंड में हुए विधनसभा चुनाव नतीजों पर कोई खास असर नहीं दिखाई दिया। लेकिन पड़ोसी राज्य हिमाचल में ये बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया।

इस बारे में मोर्चा के प्रदेश प्रभारी विक्रम सिंह रावत ने कहा कि अब सरकारों को सोचना होगा कि कर्मचारियों का साथ सत्ता में बने रहने के लिए कितना जरूरी है।  यदि पेंशन विरोधी सरकारें न चेती तो उसका खामियाजा उन्हें भुगतना होगा। कर्नाटक में आए विधानसभा चुनाव परिणाम भी इसी की परिणीति है। प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष जयदीप रावत ने कहा कि यदि कर्मचारी इसी प्रकार एकजुट हो जाएं तो वह प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में पुरानी पेंशन बहाल करके दम लेंगे।

उन्होंने कहा कि 2024 लोकसभा चुनाव से पहले यह केंद्र सरकार के लिए भी एक चेतावनी है। गढ़वाल मंडल अध्यक्ष पूरन सिंह फर्स्वाण ने कहा कि जब-जब कर्मचारी का शोषण हुआ है तो उसने सताओं को बदला है और आने वाले समय में इसका नतीजा सबके सामने होगा। गढ़वाल मंडल सचिव नरेश कुमार भट्ट ने कहा कि पुरानी पेंशन व्यवस्था जो कि कर्मचारियों का हक है और उसके भविष्य का सहारा है उसे अवश्य ही लागू होना चाहिए। कुमाऊं मंडल के अध्यक्ष योगेश घिल्डियाल ने कहा कि यदि देश में एक विधान एक संविधान है, तो सभी के लिए एक पेंशन होनी चाहिए।

कुमाऊं संयोजक आनंद सिंह पुजारी ने कहा कि हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक संघर्षरत रहेंगे और प्रदेश के कर्मचारियों को भी प्रेरित करेंगे कि वह उन राज्यों से सबक लें जहां कर्मचारियों ने अपनी ताकत के सहारे सत्ता परिवर्तित कर पुरानी पेंशन बहाल करवाई है। दीप जोशी ने कहा कि कर्मचारियों के सब्र का बांध टूट चुका है इसलिए कर्मचारी आने वाले समय में लोकतांत्रिक तरीके से ही अपनी मांग को मनाएंगे।

बहरहाल कर्नाटक चुनाव के नतीजों को पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा इससे बड़े स्तर पर खुद को मजबूत महसूस कर रहा है। लेकिन बावजूद इसके वह राज्य और केंद्र की बीजेपी और नरेंद्र मोदी सरकार का खुलकर नाम लेने से बच रहा है। यानि मामला अभी निर्णायक स्थिति में नहीं दिख रहा।

बहरहाल कर्नाटक, हिमाचल, राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों ने कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। अब देखना होगा कि वर्तमान में भाजपा शासित प्रदेशों के कर्मचारियों और पारिवारिक मतदाताओं का ये दबाव कितना राजनीतिक असर डालता है ?