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MEDIA LIVE : नतीजे आने से पहले ही मोर्चों पर किलेबंदी में जुटी बीजेपी-कांग्रेस

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मीडिया लाइव के लिए देहरादून से पंकज चौहान की रिपोर्ट: अगले चौबीस घंटे में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के रुझान आने शुरू हो जाएंग और दोपहर से पहले पहले सरकार किसकी बन रही है साफ हो जायेगा। लेकिन जिस तरह से उत्तराखंड में बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनाव नतीजों को लेकर रस्साकस्सी चल रही है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि किसी कि भी हालत अकेले दम पर सरकार बनाने वाले आत्म विश्वास कि नहीं है। इस राज्य कि कई विधानसभा सीटों पर निर्दलीयों के हाथ में भी बड़ी बाजी हो सकती है। जैसे कि चुनाव के बाद अटकले लगाई जा रही हैं। यही कारन है कि कांग्रेस और बीजेपी के राष्टीय नेताओं को उत्तराखंड में भेजा गया है। ताकि सत्ता की चाभी हथियाने में किसी तरह कि कोई कोर कसर न रह जाए। कई मायनों में यह चुनाव दोनों ही दलों के राजनीतिक भविष्य और 2024 के लोक सभा चुनाव की तस्वीर कि परछाई साबित हो सकता है।

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बता दें कि इसी कारण से उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नतीजे आने से पहले ही हाई वोल्टेज राजनीतिक ड्रामे की आशंका बढ़ गयी है। सूबे में अब तक बारी-बारी काबिज रही भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने मोर्चों घेराबंदी करने में लग गयी हैं। इसी कड़ी में भाजपा ने सरकार बनाने के अभियान पर जोड़-तोड़ की राजनीति के रणनीतिकार राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय को देहरादून भेजा तो वहीं कांग्रेस ने कई नेताओं को उत्तराखंड में उतार दिया है।

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दोनों ही दलों के ये नेता प्रदेश के क्षत्रपों के साथ गुप्त बैठकें कर रहे हैं। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस के नेता जिताऊ समझे जाने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों से भी मिल रहे हैं। जो इन दोनों ही दलों के लिए जोड़ तोड़ कर जीतने कि स्थिति में सरकार बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं। ऐसे निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी अपनी रणनीति का साफ तौर पर खुलाशा नहीं किया है, मौके की नजाकत और उसकी ताकत को समझ रहे हैं।

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दोनों ही दलों के प्रमुख स्थानीय नेता चाहे सीएम पुष्कर धामी हों या कांग्रेस से पूर्व सीएम हरीश रावत और प्रीतम सिंह सभी अपनी अपनी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। इन नेताओं का खाना है कि एग्जिट पोल के अनुमानों से भी अधिक सीटें उन्हें मिलाने वाली हैं। ऐसा दवा करने में दोनों में से कोई भी पीछे नहीं है। वहीं उत्तराखंड कि सियासत पर मजबूत पकड़ रखने वाले जानकार मानते हैं कि दोनों ही दल कोई भी ऐसा मुंडका नहीं छोड़ना चाहेंगे जो उन्हें सरकार बनाने में रोड़ा बने। इस लिए यहाँ नतीजे आनी के शुरूआती चरण से ही बड़ी जोड़ तोड़ शुरू हो जाएगी। हो सकता है कि पंचायत चुनावों कि तर्ज पर अपने पक्ष के विधायकों और निर्दलीयों को समेटने के लिए जबरदस्त पसीना न बहना पड़े। इसलिए बीजेपी कांग्रेस हर विकल्प पर गंभीरता से काम कर रही हैं। हो सकता है कि इस बार संवैधानिक नैतिकता कि मर्यादाएं भी लांघने में दोनों ही दल आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि अधिकांश सीटों पर मुकाबला कांटे का है। बड़े बड़े दिग्गज जीत और हार को लेकर डरे हुए हैं। इतना आत्म विश्वास किसी के चहरे पर नहीं झलक रहा है कि वह अपनी जीत का एक तरफा दावा कर सके।

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गौरतलब है कि कांग्रेस बीजेपी के सियासी डंक से 2016 में पहले ही सेंधमारी का शिकार हो चुकी है। जाहिर है कि ऐसे में उसने अपनी रणनी में कुछ न कुछ बड़ा बदलाव किया हो। वह कोई भी चूक नहीं करना चाहेगी। इसके लिए कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक बुधवार को छत्तीसगढ़ से भूपेश बघेल के भी देहरादून पहुंचने की चर्चा है। इसे भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।

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