
मसूरी शरदोत्सव 2026 का शानदार आगाज, बसंती बिष्ट के जागर से गूंजा टाउन हॉल
सुनील सिंह, देहरादून, 8 अक्टूबर 2026:मसूरी शरदोत्सव 2026 का रंगारंग आगाज मंगलवार को हो गया। पर्यटन नगरी मसूरी में 5 दिन चलने वाले इस सांस्कृतिक मेले की शुरुआत गांधी चौक से हुई। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान और नगर पालिका अध्यक्ष मीरा सकलानी ने ध्वजारोहण कर मेले का उद्घाटन किया। यह महोत्सव 6 से 10 अक्टूबर तक चलेगा। पहले दिन रिमझिम बारिश और कोहरे के बीच पद्मश्री बसंती बिष्ट के जागर और पांडवाज बैंड की प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
उद्घाटन समारोह और मौसम का मिजाज
उत्सव के पहले दिन पहाड़ों की रानी ने एक बेहद खूबसूरत और जादुई रूप अख्तियार कर लिया था। सुबह से ही शुरू हुई रिमझिम बारिश, चारों तरफ फैले घने सफेद कोहरे और घाटी से आती ठंडी हवाओं के प्राकृतिक मिजाज ने मसूरी शरदोत्सव 2026 की रंगत में चार चांद लगा दिए। मौसम के इस बदले मिजाज के बावजूद लोगों का उत्साह रत्ती भर भी कम नहीं हुआ।
सैलानी और स्थानीय लोग छाते लेकर माल रोड और गांधी चौक पर डटे रहे। सर्वे मैदान से लेकर गांधी चौक तक निकाली गई भव्य सांस्कृतिक शोभायात्रा में उत्तराखंड के अलावा पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लोक नृत्यों की झांकियां भी देखने को मिलीं। विशेष रूप से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उत्तराखंड के जननायक इंद्रमणि बडोनी के जीवन पर आधारित झांकियां आकर्षण का मुख्य केंद्र रहीं, जिन्होंने दर्शकों को भावुक और प्रेरित किया।
बसंती बिष्ट और पांडवाज बैंड की जुगलबंदी
मसूरी शरदोत्सव 2026 के पहले दिन की सांस्कृतिक शाम का मुख्य आकर्षण नगर पालिका टाउन हॉल में आयोजित कार्यक्रम रहा। कार्यक्रम की शुरुआत उत्तराखंड की लोक संस्कृति की ध्वजवाहक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित बसंती बिष्ट के पारंपरिक जागर गायन से हुई। उन्होंने जब अपनी सुरीली और अलौकिक आवाज में भगवान कृष्ण, सेम नागराज और आंछरियों के पौराणिक जागरों का गायन शुरू किया, तो पूरा सभागार भक्ति रस में डूब गया। देवभूमि की इस प्रामाणिक जागर शैली को लाइव सुनकर हॉल में बैठे कई दर्शकों की आँखें नम हो गईं और पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
बसंती बिष्ट के बाद मंच संभाला उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय और युवाओं के पसंदीदा ‘पांडवाज़’ (Pandavaas) बैंड ने। पांडवाज की टीम ने मंच पर आते ही अपने रॉक-फ्यूजन संगीत से समां बांध दिया। उन्होंने गढ़वाली गीतों की ऐसी मनमोहक प्रस्तुति दी, जिसमें हुड़का, ढोल-दमाऊं जैसे पारंपरिक पहाड़ी वाद्ययंत्रों और विदेशी पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के बीच एक गजब की जुगलबंदी देखने को मिली। बैंड के मशहूर गढ़वाली लोक गीतों पर टाउन हॉल में बैठा हर एक दर्शक, चाहे वह स्थानीय नागरिक हो या दूर-दराज से आया पर्यटक, अपनी सीट से उठकर झूमने और नाचने को मजबूर हो गया।