
राष्ट्रीय औषधीय पादप संगोष्ठी: HNB गढ़वाल विश्वविद्यालय में हिमालयी जड़ी-बूटियों पर राष्ट्रीय मंथन`
गणेश नेगी, श्रीनगर, 6 अक्टूबर 2026: राष्ट्रीय औषधीय पादप संगोष्ठी का आगाज सोमवार को श्रीनगर गढ़वाल में हुआ। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। इस संगोष्ठी का आयोजन राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, भारत सरकार की परियोजना के तहत किया गया है। पहले ही दिन हिमालय की पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन और औषधीय पौधों से ग्रामीणों की कमाई कैसे बढ़े, इस पर बड़े मंथन हुआ।
राष्ट्रीय औषधीय पादप संगोष्ठी में क्या हुआ?
यह दो दिवसीय राष्ट्रीय औषधीय पादप संगोष्ठी हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर के हैप्रेक केंद्र में आयोजित हो रही है। इसमें देशभर के वैज्ञानिक, प्रोफेसर और शोधकर्ता जुटे हैं।
6 अक्टूबर 2026 से शुरू हुई इस संगोष्ठी का मकसद हिमालयी क्षेत्र की समस्याओं पर बात करना है। वक्ताओं ने कहा कि शोध सिर्फ किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों की असली समस्या का समाधान भी करे। संगोष्ठी में बदलते भू-उपयोग, जलवायु परिवर्तन, कृषि और औषधीय पादप संसाधनों पर चर्चा हुई।
NMPB के CEO डॉ. महेश दधिच ने कहा
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली के सीईओ डॉ. महेश के. दधिच मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि औषधीय और सुगंधित पौधों के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को जमीन पर उतारना होगा।
उन्होंने 4 बातों को सबसे जरूरी बताया – अच्छी रोपण सामग्री, जैविक खेती, बेहतर बाजार और युवाओं का उद्यम। डॉ. दधिच ने कहा कि मौसम, जमीन, पानी और बीज की गुणवत्ता ही औषधीय पौधों की ताकत तय करती है। हिमालय की जलवायु उच्च गुणवत्ता वाली जड़ी-बूटियों के लिए सबसे अच्छी है। इसलिए यह क्षेत्र औषधीय खेती का हब बन सकता है।
डॉ. दधिच ने किसानों के पारंपरिक ज्ञान को विज्ञान से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुर्लभ और महंगी जड़ी-बूटियों के लिए प्रमाणित बीज मिलना बहुत जरूरी है। उन्होंने एक जिला-एक जड़ी-बूटी की सोच को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। मतलब हर जिले की मिट्टी और मौसम के हिसाब से अलग औषधीय फसल उगाई जाए। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और रोजगार भी मिलेगा।
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उन्होंने कहा कि कोई भी नई फसल लगाने से पहले उसकी लागत और मुनाफे का हिसाब जरूर लगाएं। किसानों के लिए हर्बल मंडियों का मजबूत नेटवर्क बनाना होगा ताकि उन्हें सही दाम मिल सके। युवाओं को इस सेक्टर में स्टार्टअप शुरू करना चाहिए।
हिमालय आपदाओं के प्रति संवेदनशील है: प्रो. पंवार
विशिष्ट अतिथि गढ़वाल विश्वविद्यालय के डीन रिक्रूटमेंट एवं पदोन्नति प्रो. मोहन सिंह पंवार ने हिमालय की नाजुक स्थिति पर बात की। उन्होंने कहा कि हिमालय प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बहुत संवेदनशील है।
उन्होंने बताया कि भू-उपयोग में बदलाव, जनसंख्या बढ़ना और खेती के तरीकों में बदलाव का असर पारंपरिक खेती पर पड़ रहा है। किसानों को समय पर मौसम की जानकारी और ट्रेनिंग देना जरूरी है ताकि वे सही फसल चुन सकें। उन्होंने कहा कि अब मिश्रित खेती की जगह एक ही फसल उगाने का चलन बढ़ रहा है, जो हिमालय की खेती के लिए ठीक नहीं है।
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औषधीय पादपों के प्रमाणिक कच्चे माल की जरूरत: डॉ. त्रिपाठी
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, देहरादून के कुलपति डॉ. अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि अब लोग सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि सेहतमंद रहने पर भी ध्यान दे रहे हैं। इसलिए अच्छी गुणवत्ता वाले औषधीय पौधों और हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि मांग के हिसाब से प्रमाणिक कच्चा माल नहीं मिल रहा है, इसलिए बाजार में मिलावट का डर रहता है। किसानों को वैज्ञानिक ट्रेनिंग और मदद देनी होगी। जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा और पौधों को उगाने से लेकर जांचने तक एक पूरी व्यवस्था बनानी होगी। पौधों की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें कब तोड़ा गया, किस मिट्टी और मौसम में उगाया गया।
इस मौके पर कुलसचिव प्रो. वाईपी रैवानी, डीन एग्रीकल्चर एंड एलाइड साइंस प्रो. आरएस नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओपी गुसांई, बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. एचबीएस चैहान, प्रो. एमएम सेमवाल के साथ हैप्रेक के निदेशक प्रो. विजयकांत पुरोहित, डाॅ. बबिता पाटनी, संगोष्ठी की सचिव डाॅ. विजयलक्ष्मी त्रिवेदी, जन संपर्क अधिकारी आशुतोष बहुगुणा सहित कई लोग मौजूद थे।