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MEDIA LIVE : राजनीतिक नज़र: पूर्ण बहुमत वाली भाजपा और डॉ. धन सिंह रावत

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विपिन, पोलिटिकल डेस्क : उत्तराखंड में बीजेपी एक बार फिर पूर्ण बहुमत में आ चुकी है। अब इन्तजार नई सरकार के गठन और आकार को लेकर हो रहा है। हर किसी की जुबान पर यही चर्चा इन दिनों तैर रही है कि राज्य का अगला सीएम कौन होगा ? पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार चुके हैं। इसके अलावा पार्टी ने उनके मुख्यमंत्री रहते हुए, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ ही चुनाव लड़ा। चुनावी जीत का श्रेय भी मोदी और केंद्र की विकास परक योजनाओं को दिया गया। अब सवाल यह मौजूं है कि उत्तराखंड का अगला सीएम कौन होगा ? और नए मंत्रिमंडल में किस-किस को जगह मिलेगी। क्या सभी जगहों पर वही पुराने चहरे रिपीट होंगे ? या मुख्यमंत्री सहित राज्य को कुछ अन्य नए मंत्री देखने को मिलेंगे?
चुनाव हारने के बाद इस वक्त अगर पुष्कर धामी को किसी तरह दुबारा मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है, जैसी कि चर्चाएं हो रही हैं। हालाँकि उनके लिए कई विधायक अपनी विधानभा सीट छोड़ने को तैयार हैं। लेकिन हो सकता है कि पार्टी उन्हें सांगठनिक जिम्मेदारी से नवाजे और मुख्यमंत्री के रूप में किसी विधायक को ही मौक़ा मिले। ये सब पार्टी आलाकमान को तय करना है। यदि ऐसा होता है, तो सबसे प्रबल संभावनाएं श्रीनगर से लगातार दूसरी बार विधायक चुनकर आये और वर्तमान कार्यवाहक सरकार में बतौर कैबिनेट मंत्री काम कर रहे डॉ धन सिंह रावत की बनती दिखाई दे रही हैं। पार्टी के आदेशों और कार्यशैली के प्रति जो रुख आज तक डॉ रावत का रहा है, वह किसी और मौजूदा भाजपाई नेता में दिखाई नहीं देता। रावत हमेशा से पार्टी के निर्णय के साथ खड़े रहने वाले साधारण कार्यकर्ता की तरह देखे जाते रहे हैं। पार्टी का आदर्श और आदेश हमेशा उनके लिए शिरोधार्य रहे हैं। उन्होंने कभी किसी गुटबाजी का दुष्प्रभाव खुद पर नहीं होने दिया। वे हमेशा नेतृत्व के साथ खड़े नजर आते रहे हैं। मजबूत सांगठनिक ढाँचे कि बारीकी को धन सिंह बहुत बेहतर तरीके से समझते और बूझते हैं। इस मामले में बीजेपी में उनका दूसरा कोई सानी नहीं है। पार्टी के तमाम नेताओं को कुछ न कुछ गुटबाजी और नाराजगी को जाहिर करते हुए देखा गया है। खास कर वे नेता जो मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर हमेशा महत्वकांक्षी रहे हैं।


पूर्व में भी कई बार मुख्यमंत्री को लेकर उनका नाम चर्चाओं में लाया जाता रहा। लेकिन उन्होंने कभी भी पार्टी में किसी पद के लिए अपनी कोई इच्छा जाहिर नहीं की खास कर सार्वजनिक और गुटबाजी के तौर पर। इसी का परिणाम है कि पिछली निर्वाचित विधानसभा में पहली बार जीत कर आने के बावजूद वे पहले स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री बनाए गए और फिर उन्हें उनके कामों की वजह से कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी से नवाजा गया। उनकी पार्टी संगठन और केंद्रीय नेतृत्व में गहरी आस्था और पकड़ का ही नतीजा है कि वे हमेशा शीर्ष नेतृत्व के भरोसेमंद रहे हैं।
अब भी डॉ रावत ने साफ़ तौर पर कह दिया है कि ! वे किसी भी पद की दौड़ का हिस्सा नहीं हैं। यही बड़प्पन और सादगी पार्टी में उनको अलग खड़ा करती है। वे किसी भी तरह की लॉबिंग में विश्वास नहीं करते, इन्ही खासियतों के चलते वे बेहद शार्प राजनीतिज्ञ के तौर पर उभर कर सामने आ रहे हैं। पार्टी की लाइन और कार्यशैली से वे बहुत गहराई से वाकिफ हैं। उनकी उम्र और अनुभव उन्हें और गंभीर राजनेता के रूप में स्थापित करने में मदगार साबित हो रही है।

गौरतलब है कि श्रीनगर राठ क्षेत्र की जनता को बेहद गंभीर और कुशल मतदातों में सुमार किया जाता है। वे अपना वोट बेहद सोच समझकर डालते हैं। नेता को पूरी तरह निचोड़ कर रख देने में उन्हें महारथ हासिल है। यही वजह है कि इस विधानभा सीट पर आज तक कोई भी नेता लगातार दो बार विधायक रिपीट नहीं हो पाया, लेकिन इस बार डॉ धन सिंह रावत इस मिथक को तोड़ने में पूरी तरह कामयाब हुए। इसके अलावा यहाँ के वोटर इस बात के लिए भी जाने जाते रहे हैं कि जिस पार्टी की सरकार सत्ता में आने वाली होती है, उसके प्रत्याशी को वे विधायक बना कर सदन में भेज देते हैं। यहाँ हमेशा से विधायक सत्ताधारी दल से जीत कर आते रहे हैं। इसलिए यहाँ विकास का पहिया कभी नहीं रुका। शायद यही कारण रहा कि श्रीनगर राठ क्षेत्र की जनता ने अंततः बीजेपी की सत्ता में वापसी को देखते हुए एक बार फिर डॉ धन सिंह रावत को विधानसभा भेज दिया है। यूं तो इस सीट पर मुकाबला बेहद कांटेदार और दिलचस्प रहा, लेकिन आखिर विजयश्री वोटरों ने धन दा के गले में डालने का ही निर्णय लिया। ऐसे में धन सिंह रावत का धैर्य उनके लिए वरदान साबित हुआ, वे लगातार परिश्रम करते दिखाई देते हैं। विधान सभा क्षेत्र में इतनी सक्रियता शायद ही किसी और मंत्री की रही होगी। इसमें कोई दो राय नहीं। शायद इसलिए भी क्योंकि डॉ रावत अपनी विधानसभा क्षेत्र की जनता के स्वाभाव और उनकी राजनीतिक समझ से बहुत अच्छे से वाकिफ हैं, तभी उन्होंने चुनाव लड़ने में और लोगों के बीच बने रहने में कोई कोताही नहीं बरती। इस बात से यह साबित हो जाता है कि वे एक-एक वोटर के महत्व को भलीभांति परखते और समझते हैं। पार्टी में लंबा सांगठनिक अनुभव और चुनाव लड़ने का हुनर उन्होंने बहुत शानदार ढंग से सीखा है। वे अपने पूर्ववर्तियों की तरह मैदान छोड़ने वालों में भी सुमार नहीं हुए। रावत चाहते तो बहुत आसानी से खुद के लिए कोई आसान सीट चुनकर विधानसभा पहुँच सकते थे। ऐसा करना उनके लिए बहुत मुश्किल टास्क नहीं था। लेकिन अपने लोगों के बीच उनकी नाराजगी और आक्रोश को आत्मसात कर, उन्हें गले लगा कर जीत का रास्ता कैसे प्रसस्त किया जाता है, ये धन दा ने साबित कर दिखाया है।

अब बात इससे आगे की

रावत चुनाव जीत चुके हैं, समर्थकों की तरफ से बधाइयों का तांता लगा है। जिंदाबाद के जयकारे रोजाना गूँज रहे हैं। लेकिन किसी बड़ी जिम्मेदारी के बारे में पूछने पर एक बेहद सरल और सहज ढंग से उत्तर सामने से मिलता है कि ! मैं किसी पद और दौड़ का हिस्सा नहीं हूँ। मेरी पार्टी के संविधान रीति नीति से मैं वाकिफ हूँ। यहाँ किसी दौड़ और महत्वकांक्षा के लिए कोई जगह नहीं है। सब कुछ पार्टी संगठन देश काल परिस्थिति के हिसाब से तय करती है। वक्त-वक्त पर लोगों को जिम्मेदारियां उनकी पार्टी के लिए उपयोगिता को देखते हुए तय की जाती हैं। यहाँ सब कार्यकर्ता की भूमिका में होते हैं। पद और जिम्मेदारी जिसे सौंपी जाती है, उसे उसका निर्वहन करना होता है।
बता दें कि डॉ धन सिंह ने यही अदा और तरीका अपनी पार्टी से बहुत गंभीरता से सीखा है, यह उन्हें देखने से ही लग जाता है। शायद इसीलिए ये तमाम बातें, उन्हें पार्टी के विश्वस्त नेताओं और कार्यकर्ता में शुमार करती हैं, जो शायद इस वक्त बीजेपी के किसी अन्य नेता में उनकी तुलना में कम ही महसूस की जा सकती हैं।

इसके अलावा अब बात अन्य नामों की हो रही है, जिनपर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। यदि उन नामो में से किसी पर मोहर लगती भी है, तो बहुत आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि पार्टी को इसके बाद 2024 में होने वाले लोक सभा चुनाव कि तैयारी को देखते हुए भी निर्णय लेना है। लिहाजा पार्टी सांगठनिक जरूरतों की परख रखने वाले चेहरे को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकती है, जो विधायकों, मंत्रियों और कार्यकर्ताओं के केंद्र बिंदु में सुमार हो। यही निर्णय बीजेपी के लिए इस वक्त शुभांकर की भूमिका निभाएगा।